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कोई संग नहीं है

 ठहरी सी जिंदगी में अब कोई रंग नहीं है, भटक रहा हूं अकेला कोई संग नहीं है, अपने होने का वादा तो यहां सब कर रहे, परख कर देखा जो तो कोई अपना नहीं है।। इंजीनियर राजन सोनी

हिंदी की महिमा

 हिंदी की तुम विधा को देखो, कितनी मन को भाती है। गद्य–पद्य में आकर देखो, सबके मन को छू जाती है। भारत माता है इसकी जननी, और यहीं से यह पोषण पाती है। हवा से बहती हुई देखो, भारत की खुशबू फैलाती है। अपनी विविध कला को दिखलाकर, जन-जन के मन को लुभाती है। जो भी इसको धारण करता, फिर बस उसी की हो जाती है। प्रेम पुलकित हो उठता तन-मन, इसकी एक बूँद मिल जाने पर। सोचो कितना आनंद मिलेगा, हिंदी मंच पे चढ़ जाने पर। पर इसकी अनुपम लीला देखो, कभी न खुद पर इठलाती है। अनंत लोग हों गर विह्वल तो भी, सबको मस्त मगन कर जाती है। हिंदी की तुम विधा को देखो, कितनी मन को भाती है। — इंजीनियर राजन सोनी अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश

बड़ी मुश्किल से पाया हूँ

 बड़ी मुश्किल से पाया हूँ, तुम्हें अब खो नहीं सकता। तुम्हारा हो गया हूँ अब, किसी का हो नहीं सकता। मेरे हृदय में तो बस, तुम्हारा ही रूप बसता हैं। निकल जाओ तुम मेरे दिल से, कभी ये हो नहीं सकता।। - इंजीनियर राजन सोनी

कोई मशहूर होता है

 कोई मशहूर होता है, कोई मजबूर होता है। कोई पाकर के हंसता है,कोई पाकर के रोता है। इश्क के तालीम में सब पास नहीं होते, कोई रांझा बनता है, तो कोई हीर होता है। - इंजीनियर राजन सोनी

दिल की आवाज

 मेरे हिस्से की चीज,दूसरे को दे रहे हो। वफा कर रहे हो मुझसे, य दगा दे रहे हो। बहुत हो चुका ये खेल अब प्रिए  बता भी दो तुम किस बात की, मुझे सजा दे रहे हो।

नौकरी

 जाने किस कदर यह नौकरी, लोगों को भा गया,  जाने किस कदर यह नौकरी, लोगों को भा गयाl  मेरे नजरिए से देखे तो, सारे रिश्ते नातो को खा गयाl  कर दिया दूर हमें सुख की छांव से,  बचपन जहां था बीता, उस प्यारे से गांव से! सुख की दशा भूल कर ,हम दुख में जी रहे।  दोस्ती का जाम छोड़ कर,  अब हम आंसुओं को पी रहेl   हालत क्या है यहां पर कैसे बताऊं यारोl  दिए कितने जख्म इसने कैसे दिखाऊं यारों।  लगता है सबको अब हम तो शहंशाह हो गए,  इस नौकरी के चक्कर में हम बेपनाह हो गए।  शांति कभी मिली न और ना ही सुख मिला।  क्या ऐसे ही चलता रहेगा यह नौकरी का सिलसिलाl इंजी.राजन  सोनी *निर्मय* अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश

*माँ की महिमा*

माँ की महिमा न्यारी जग में,  माँ हैं सबसे प्यारी जग में मां ने हमको दूध पिलाया,  गोदी में लेकर हमें खिलाया।  सर्दी गर्मी से हमें बचाया,  खुद भूखे रहकर के भी  अपना निवाला हमें खिलाया।  माँ है बड़ी उपकारी जग में  मां की महिमा न्यारी जग में। प्रातः काल में हमें उठाती,  धीरे से अपने गले लगाती। नहला कर हमको तैयार कराती  चंदन टीका हमें लगाती  प्रेम से अपने पास बुलाकर  हाथों से अपने हमें खिलाती,  माँ है बड़ी सुखकारी जग में,  मां की महिमा न्यारी जग में।  छोटी-छोटी बातों पर,  माँ से हम रूठा करते थे  झूठ मूठ कोने में जब,  सिसकियां भरते थे  प्रेम की मूरत मां को देखो,  पास हमारे आती थी  लेकर हमको गोद में अपने  बड़े स्नेह से हमको मनाती थी।  माँ है दुखहरनी जग में  मां की महिमा न्यारी जग में। *इंजी.राजन सोनी*"निर्मय"  अम्बेडकर नगर,उत्तर प्रदेश सम्पर्क सूत्र:- 8601240597