नौकरी
जाने किस कदर यह नौकरी, लोगों को भा गया,
जाने किस कदर यह नौकरी, लोगों को भा गयाl
मेरे नजरिए से देखे तो, सारे रिश्ते नातो को खा गयाl
कर दिया दूर हमें सुख की छांव से,
बचपन जहां था बीता, उस प्यारे से गांव से!
सुख की दशा भूल कर ,हम दुख में जी रहे।
दोस्ती का जाम छोड़ कर,
अब हम आंसुओं को पी रहेl
हालत क्या है यहां पर कैसे बताऊं यारोl
दिए कितने जख्म इसने कैसे दिखाऊं यारों।
लगता है सबको अब हम तो शहंशाह हो गए,
इस नौकरी के चक्कर में हम बेपनाह हो गए।
शांति कभी मिली न और ना ही सुख मिला।
क्या ऐसे ही चलता रहेगा यह नौकरी का सिलसिलाl
इंजी.राजन सोनी *निर्मय*
अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
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