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नौकरी Er. Rajan Soni

 जाने किस कदर यह नौकरी, लोगों को भा गया,  जाने किस कदर यह नौकरी, लोगों को भा गयाl  मेरे नजरिए से देखे तो, सारे रिश्ते नातो को खा गयाl  कर दिया दूर हमें सुख की छांव से,  बचपन जहां था बीता, उस प्यारे से गांव से! सुख की दशा भूल कर ,हम दुख में जी रहे।  दोस्ती का जाम छोड़ कर,  अब हम आंसुओं को पी रहेl   हालत क्या है यहां पर कैसे बताऊं यारोl  दिए कितने जख्म इसने कैसे दिखाऊं यारों।  लगता है सबको अब हम तो शहंशाह हो गए,  इस नौकरी के चक्कर में हम बेपनाह हो गए।  शांति कभी मिली न और ना ही सुख मिला।  क्या ऐसे ही चलता रहेगा यह नौकरी का सिलसिलाl इंजी.राजन  सोनी *निर्मय* अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश

माँ की महिमा Er. Rajan Soni

माँ की महिमा न्यारी जग में,  माँ हैं सबसे प्यारी जग में मां ने हमको दूध पिलाया,  गोदी में लेकर हमें खिलाया।  सर्दी गर्मी से हमें बचाया,  खुद भूखे रहकर के भी  अपना निवाला हमें खिलाया।  माँ है बड़ी उपकारी जग में  मां की महिमा न्यारी जग में। प्रातः काल में हमें उठाती,  धीरे से अपने गले लगाती। नहला कर हमको तैयार कराती  चंदन टीका हमें लगाती  प्रेम से अपने पास बुलाकर  हाथों से अपने हमें खिलाती,  माँ है बड़ी सुखकारी जग में,  मां की महिमा न्यारी जग में।  छोटी-छोटी बातों पर,  माँ से हम रूठा करते थे  झूठ मूठ कोने में जब,  सिसकियां भरते थे  प्रेम की मूरत मां को देखो,  पास हमारे आती थी  लेकर हमको गोद में अपने  बड़े स्नेह से हमको मनाती थी।  माँ है दुखहरनी जग में  मां की महिमा न्यारी जग में। *इंजी.राजन सोनी*"निर्मय"  अम्बेडकर नगर,उत्तर प्रदेश सम्पर्क सूत्र:- 8601240597

पहचान बनानी है Er. Rajan Soni

पहचान बनानी है तो, मेहनत करना होगा। आने वाली हर बाधाओ से, निडर हो लड़ना होगै। मंजिल पाने के लिए, धैर्य तो रखना होगा। पथ पर चलते-चलते असफलताओं को भी गले लगाना होगा। दुर्गम पथ को देख कहीं, विचलित मन से भी लड़ना होगा। अगर डगर को छोड़ दिए तो, हार का हार पहनना होगा। बन सच्चा पथिक तुम आगे बढ़ना, जब तक शक्ति है मन में, तब तक तुम संघर्ष करना। कभी भीड़ भरी सड़कों पर तो, कभी निर्जन वन में चलना होगा। सफर में साथ ना कोई तेरे होगा, अकेले ही तुम्हें मंजिल तक पहुंचना होगा। साहस को संग में रखना, सच्चाई का ही साथ पकड़ना। कभी सीधे रास्ते मिलेंगे तुमको, तो कभी ऊंचे पर्वत चढ़ाना होगा। पहचान बनानी है तो, मेहनत करना होगा।       इंजी.राजन सोनी "निर्मय" अम्बेडकर नगर,उत्तर प्रदेश       8601240497

अनपढ़ी कहानी Er. Rajan Soni

जिसे पढ़ ना सका कोई आज तक , मैं वह अनपढ़ी कहानी हूं ।  कल कल करती इन नदियों की , धाराओं में बहता पानी हूं। वीरों के लहू से सिंचित,  भारत माता ओढ़े हैं जिसको,  मैं वह चूनर धानी हूं। कबीर,नानक और दादू जैसे संतों का में गूँजता अमृतवाणी हूं। थोड़ा सा स्वाभिमानी हूं , थोड़ा सा अभिमानी हूं  गर्व मुझको कि मैं भी एक हिंदुस्तानी हूं। पढ़ ना सका जिसे कोई आज तक  मैं वह अनपढ़ ही कहानी हूं। इंजी.राजन सोनी "निर्मय" अम्बेडकर नगर,उत्तर प्रदेश

जिंदगी Er. Rajan Soni

 देखता हूं ए जिंदगी ,  तू मुझको कितना गिराएगी । ऐसा तो कभी समय आएगा,  जब तू मुझको ऊपर उठाएगी।  हार नहीं मानूंगा तुझसे और तेरी  इन परिस्थितियों से। तू मुझे कब तक इन कटीले,  पथों पर दौड़ाएगी। तू जितना सोचती है,  मैं उतना तो कमजोर नहीं । क्यों इतराती है इतना,  तेरी छाया तो चहु ओर नहींl तुझ में कहां है इतनी हिम्मत,  जो तू मेरी हस्ती मिटाएगी।  देखता हूं ऐ जिंदगी,  तू मुझे कितना गिराएगी।      *इंजी.राजन सोनी*  *अम्बेडकर नगर,उत्तर प्रदेश*

सभ्यता का पतन Er. Rajan Soni

मानवता से नाता तोड़ दिया पशुता से नाता जोड़ लिया पाश्चात्य संस्कृत को अपना करके अपनी सभ्यता का पतन किया शील, क्षमा, संतोष, दया वो मानव के थे बहुमूल्य आभूषण जो खोकर प्रेम का गहना देखो पशुवत जीने को मजबूर हुआ छोड़ अमृत रस का प्याला हलाहल विष का पान किया मानवता से नाता तोड़ दिया परंपरा और रीति-रिवाजों से देखो सबको शर्म है आती वो बाजरे और मक्के की रोटी अब कहां किसी के मन को भाती अब कहां कोयलिया डाल पर बैठे अपनी मधुर ध्वनि सुनाती दादी और नानी मां की कहानी अब कहां बच्चों के मन को भाती अब कहां रहट व चरखे चलते अब कहां पक्षी दल नभ में कोलाहल है करते कुछ मानवो ने इनका अंत किया मानवता से नाता तोड़ दिया - इंजी.राजन सोनी "निर्मय" अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश