सभ्यता का पतन
मानवता से नाता तोड़ दिया
पशुता से नाता जोड़ लिया
पाश्चात्य संस्कृत को अपना करके
अपनी सभ्यता का पतन किया
शील, क्षमा, संतोष, दया
वो मानव के थे बहुमूल्य आभूषण
जो खोकर प्रेम का गहना देखो
पशुवत जीने को मजबूर हुआ
छोड़ अमृत रस का प्याला
हलाहल विष का पान किया
मानवता से नाता तोड़ दिया
परंपरा और रीति-रिवाजों से
देखो सबको शर्म है आती
वो बाजरे और मक्के की रोटी
अब कहां किसी के मन को भाती
अब कहां कोयलिया डाल पर बैठे
अपनी मधुर ध्वनि सुनाती
दादी और नानी मां की कहानी
अब कहां बच्चों के मन को भाती
अब कहां रहट व चरखे चलते
अब कहां पक्षी दल नभ में कोलाहल है करते
कुछ मानवो ने इनका अंत किया
मानवता से नाता तोड़ दिया
- इंजी.राजन सोनी "निर्मय"
अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
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