मेरे हिस्से की चीज,दूसरे को दे रहे हो। वफा कर रहे हो मुझसे, य दगा दे रहे हो। बहुत हो चुका ये खेल अब प्रिए बता भी दो तुम किस बात की, मुझे सजा दे रहे हो।
हिंदी की तुम विधा को देखो, कितनी मन को भाती है। गद्य–पद्य में आकर देखो, सबके मन को छू जाती है। भारत माता है इसकी जननी, और यहीं से यह पोषण पाती है। हवा से बहती हुई देखो, भारत की खुशबू फैलाती है। अपनी विविध कला को दिखलाकर, जन-जन के मन को लुभाती है। जो भी इसको धारण करता, फिर बस उसी की हो जाती है। प्रेम पुलकित हो उठता तन-मन, इसकी एक बूँद मिल जाने पर। सोचो कितना आनंद मिलेगा, हिंदी मंच पे चढ़ जाने पर। पर इसकी अनुपम लीला देखो, कभी न खुद पर इठलाती है। अनंत लोग हों गर विह्वल तो भी, सबको मस्त मगन कर जाती है। हिंदी की तुम विधा को देखो, कितनी मन को भाती है। — इंजीनियर राजन सोनी अंबेडकर नगर, उत्तर प्रदेश
बहुत अच्छा
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