बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं Er. Rajan Soni


आ के वृंदावन में गइया चराते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं।

आ के गोपी के घर माखन चुराते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


ग्वाल-बालों संग अब रास रचाते नहीं,

यमुना तट पे कान्हा अब तुम आते नहीं।

मोर मुकुट सिर पे अब सजाते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


राधा की गलियों में अब तुम आते नहीं,

प्रेम की वो मधुर धुन अब सुनाते नहीं।

देखकर हमको कान्हा मुस्कुराते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


माखन की मटकी अब तुम फोड़ते नहीं,

गोपियों से कान्हा अब कुछ बोलते नहीं।

मन की व्यथा हमसे क्यों पूछते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


तेरी ही राहों में नैन बिछाए हैं,

तेरे ही नाम के दीप हमने जलाए हैं।

एक बार आ जाओ, क्यों आते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


तेरे बिना सूना-सूना वृंदावन लगे,

तेरे बिना सूना हर एक मन लगे।

'राजन' को अपने दर्शन कराते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


आ के वृंदावन में गइया चराते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं।

आ के गोपी के घर माखन चुराते नहीं,

बोलो कान्हा अब मुरली क्यों बजाते नहीं॥


✍️इंजीनियर राजन सोनी

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